इस पक्ष का विषय - (Aug 1-15, 2010)
















राणा प्रताप सिंह राणा
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जो तपते थार में कूवाँ पुराना मिल गया है
किसी प्यासे मुसाफिर को ठिकाना मिल गया है

लगी है भीड़ कितनी देखो इस वीराने में भी
यूँ लगता है इन्हें कोई ख़जाना मिल गया है

मिला मौका, हुए खुश, यूँ वो लटका अपनी रस्सी
उन्हें मछली की आँखों का निशाना मिल गया है

भुला बैठे हैं सब हिन्दू, मुसलमाँ, ऊँची, नीची
यही पर आ के देखो ताना-बना मिल गया है

वही चंपा चमेली कैद थी अब तक जो घर में
उन्हें घर से निकलने का बहाना मिल गया है

सियासत ने बेगाना कर दिया इस गाँव से उनको
कि मंत्रालय उन्हें अब जाना माना मिल गया है
(राणा प्रताप सिंह)


पल्लव पंचोली
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ज़िन्दगी के नशे मे है झूमती जिंदगी
मौत के कुएँ मे भी है घूमती जिंदगी

जिंदगी की कीमत तो जिंदगी ही जाने
रेगिस्तान मे जलबूँद है ढूँढती जिंदगी

हो गर जवाब तो वो लाजवाब ही होवे
हर पल ऐसे सवाल है पूछती जिंदगी

कोई मिला ख़ाक मे, कोई खुद धुआँ हुआ
धरती और गगन के बीच है झूलती जिंदगी

किसी का गम किसी की मुस्कुराहट यहाँ
हर हाल में मुस्कुराके आँखे है मूंदती जिंदगी

जान ले "मासूम " रुसवाई नहीं किसी को यहाँ
मौत के भी खुश होकर पग है चूमती जिंदगी
पल्लव पंचोली (मासूम)


अनुपमा पाठक
" ठाकुर का कुआँ "

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प्रेमचंद की कहानी का
वह गाँव
कुछ कुछ सजीव होता है !
जब बात उठती है जल श्रोतों की
तो भरी भीड़ की
प्यास के आगे
बूंदों का अभाव सजीव होता है !

कहाँ है जल...
यहाँ तो
केवल
प्यासी आत्माएं खड़ी हैं
कौन बताएगा
कि
आखिर कैसे
जीवन "शव" से "शिव" होता है?!!!

अभाव के संकट से ...
कैसे उबरा जाये ...
मिलते हैं प्रभु तभी... जब
उन तक पहुचने का संकल्प अतीव होता है !
प्रकृति छेड़-छाड़ से तंग आ चुकी है ...
सूख रहे हैं जलश्रोत
मनुष्यता का यूँ तार तार हुआ जाना ...
क्या चेतन जगत
इस कदर निर्जीव होता है?!!!

हम समस्याओं और प्रश्नों से
वैसे ही घिरे हुए हैं ...
जिस तरह
जलश्रोत को घेरे ये भीड़ खड़ी है
समाधान भी होगा जरूर....
आखिर
हममे से ही तो कोई
दृढ़ उत्तर सा सजीव होता है!

एक अकेला सरल सा उत्तर
सारे प्रश्नों का हल होगा ....
हौसले की बात हो...
पानी का क्या ...
अरे! क्या हर पल
हमारी आँखों में ही नहीं
उनका अक्स आंसू बन कर
सजीव होता है ?!!!

अश्रु ढलते दृगों को
हास से परिचीत कराना है
झिलमिल बूंदों से ही
तो इन्द्रधनुषी संसार सजीव होता है !
ज़रा सी संवेदना जागे...
एक दुसरे के सुख दुःख के प्रति सरोकार हो
जीवन इन छोटे छोटे उपादानो से ही तो
सांस लेता है... चलता है ... सजीव होता है !
(अनुपमा)


रोली पाठक
"बेबसी......... "

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इच्छाएं अनंत
मन स्वतंत्र
जीवन परतंत्र......
दायित्व अपार
असहनीय भार
कैसे हों,स्वप्न साकार.....!!!
दमित मन
ह्रदयहीन तन
विचलित जीवन.......
ह्रदय की पीर
नयनों के नीर
तन, बिन चीर.......
अन्न न जल
भूख से विहल
दरिद्र नौनिहाल............
माँ की बेबसी
तन को बेचती
रोटी खरीदती..............
ह्रदय पाषाण
व्यथित इंसान
हे देश, फिर भी तू महान..........!!!
(रोली पाठक)


शाहिद अख्तर
"'हाई टी' और 'डिनर' के बाद"

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कभी देखा है तुमने
देश की तक़दीर लिखने वालों ने
क्याक क्याद ना बनाया है हमारे लिए
आग उगलती, जान निगलती
हजारों मील दूर मार करने वाली मिसाइलें हैं
हम एटमी ताकत हैं अब
किसकी मजाल जो हमें डराए धमकाए
अंतरिक्ष पर जगमगा रहे हैं
हमारे दर्जनों उपग्रह
चांद पर कदम रखने की
हम कर रहे हैं तैयारियां
और दुनिया मान रही है हमारा लोहा
हम उभरती ताकत है
अमेरिका भी कह रहा है यह बात
हां, यह बात दीगर है
कि भूख और प्याास के मामले में
हम थोड़ा पीछे चल रहे हैं
लेकिन परेशान ना हों
'हाई टी' और 'डिनर' के बाद
नीति-निर्माताओं की
इसपर भी पड़ेगी निगाह
(शाहिद अख्तर)



शमशाद इलाही अंसारी "शम्स"
”हम सब”

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यह कौन है
अभी इसी लोक में ही है
या सिधार गया परलोक
क्यों उसके शरीर को
सिर से सिर जोड़ कर
तन से तन लगा कर
एकटक होकर
बिना कुछ बोले
निशब्द से
निस्तब्ध से
पथरीली आँखों से
देख रहे हैं ये लोग
यह कौन है?
जो अपने प्राण प्रवास ऋतु पर
जोड़ गया इतने
सिर से सिर
तन से तन
हाथ से हाथ
ह्र्दय से ह्रदय
क्रंदन भी हुआ लयबद्ध
हमें दिखा गया
जीने के राह
फ़ूँकता रहा हमारी मृत देह में
सदियों से
अपने प्राणों का संचार
एक स्वर में
जोड़ गया हम सब को
वह जीवित था
वह मरा नहीं
हमने अभी जीना सीखा है
इस पहले कदम का स्वागत
धन्य हो वह शरीर भी
जिसे देखने उमड़ पडी थी भीड़
नर-नारी, बालक-वृद्ध
जिसने कराया अहसास
हमारे हम होने का
यह कोई शव नहीं है, मित्र
यह जल है.
(शमशाद इलाही अंसारी "शम्स")


राज जैन
”आशाएँ”

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गाँव की मिट्टी में पले
घूँघट की ओट से झाँकते चेहरे
कुँवे की गहराई नापने का प्रयास
प्रश्न -चिह्न लिए चेहरे
परिवार की आशाएं
जल हो न हो
जीवन तो रहेगा
खाली गगरी कौन भरेगा ?
भारतीय होने का अहसास
हिम्मत और विश्वास कौन जगायेगा
किसके हाथों डोर थमाएं
किस मोहरे के द्वार खटखटाये
कौन देगा जिम्मेदारी इन की छाओं
काश एक दिन ऐसा आ जाये
रामराज्य की कल्पना साकार हो जाये
(राज जैन)


अशोक लव
“प्यासे जीवनों के पनघट “

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कतारों की कतारें
अभावों से बोझिल क़दमों के संग
सूखे होठों की पपड़ियों को
सूखी जीभ से गीलेपन का अहसास दिलाते
प्यासी आँखों में पानी के सपने लिए
कुएँ को घेरे
प्रतीक्षारत !

कुएँ में झाँकती
प्यासी आशाएँ
कुएँ की दीवारों से टकराते
झनझनाते खाली बर्तन.

बिखरती आशाओं
प्यासे जीवनों के पनघट !
असहाय ताकते
जनसमूह
शायद..शायद ..होठों को तर करके
हलक से नीचे तक उतर जाए
पानी !!
(अशोक लव)


सिंह उमराव जातव
" तुम्हारे स्वागत में "

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राहों में पावों की आहट
दिल में हलचल सी/
उपवन में भँवरे अधीर
तितलियों में घबराहट सी/
मलयानिल मलयानिल सा
हर उपवन महक गया/
शबनम बन माणिक सी
फूलों के अधरों पर उतरी/
कोयल ने कूक कर
मुनादी सी घोषणा की-
आमद है आमद है
तुम्हारी आमद है/

हिचकियां माध्यम से द्रुत पर/
चाहत युगों की प्यास बन
गीतों में सँवर कर
भँवरों की गुनगुन सी
शब्दों को छीन गई/
अंखियन के द्वारे पर
अनुस्मृति के किवाड़ खोल
प्रतिबिंब से उकेर गई/
साँसों में मलयाचल
तन पर अबीर सा
आँचल भर बिखेर गई/
कागा की कांव कांव
बन कर आलाप सी
उद्घोषणा करे है कि-
आमद है आमद है
तुम्हारी आमद है/

मधुशाला में साकी ने
औंधे चषक सीधे किए/
नींद से झकोर कर
बोतलें चैतन्य कीं/
गज़लों के झोंके
डगमगाते से आ गए
बाहर से भटकते हुए/
बटोही राह भूल कर
मधुशाला के द्वार पर
किवाड़ खटखटाने लगे/
घुँघरू बहकने लगे
और वीणा के तार
समवेत हौले से गुनगुनाए-
आमद है आमद है
तुम्हारी आमद है/
(सिंह उमराव जातव)



शाहिद खान
“विरासत”

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शहरी ऑफिस के,
द्वार पर रखे,
उस प्लास्टिक के बड़े,
पीपे की रंगीन टोंटीयों से निकले,
झांसदार,
पश्चिमी रासायनिक पेय से,
कहीं बढ़कर,
प्यास बुझा जाते थे,
वह,
दो घूँट,
चिपचिपाहट भरे,
गरम दूध के,
जो,
माँ,
धर जाती थी,
मटमैले कपड़े में लपेट कर,
हर सुबह-शाम,
स्टडी-टेबल के कोने पर,
रखे कांच के तश्तरी,
के बीचों-बीच,
भर कर,
स्टील के ग्लास में,
जिससे आती रहती थी,
एक,
महक,
गरम राख की,
जिसके कुछ कण,
उड़कर चिपक जाते थे,
गिलास के तलवे से,
जब,
माँ फूंका करती थी,
अपनी ममता,
उस,
इक-फुटिया,
लोहे की फुंकनी के,
सुराख़ के उस पार,
आंगन के ठीक बीचोंबीच,
रखे चूल्हे के,
धीमे गर्म आंच में........................
(शाहिद खान)


रश्मि प्रभा
"कुआँ"

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रास्ते के उतार-चढ़ाव
लगते हैं कुआं और खाई
पर अक्सर यहीं से है
ज़िन्दगी की सदा आई
लड़खड़ाते क़दमों को
दिया है प्रभु ने एक ठहराव
संतुलन की परिभाषा
कुँए ने ही है बनाई ...
(रश्मि प्रभा)


अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
“कठिन डगर पनघट की”

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कठिन डगर पनघट की ..
सबका अपना अपना मधुघट सबकी अपनी मटकी || कठिन डगर ..

एक कूप ऐसा देखा है , जिसकी हुलिया ऐसी
जगत बनी लोगों की भैय्या , टूटी फूटी वैसी ,
इंतिजार की अकथ कहानी , आस-रज्जु सी लटकी ||१|| कठिन डगर ..

प्यासी पथराई आँखें सुख-सजल नहीं हो पातीं
ये रतनार उपासे रहते , क्या कहके समझातीं ?
ऊपर अवसरवादी बदरा , करता नयन - मटक्की ||२|| कठिन डगर ..

रेतीले वीरानेपन में जल पाना , मृग - तृष्णा !
दवा ज़रा सी , सौ सौ रोगी , होती घोर वितृष्णा ,
नब्बे रोते जार जार , अब कथा कहूँ क्या इनकी ! , ||३|| कठिन डगर ..

मटकी लेकर वह घर आयी लेकिन ज़रा सा पानी ,
उसको भी पीने आ पहुँची गिलहरियों की नानी ,
गुजर-बसर इतने में करना , इच्छा यही नियति की ||४|| कठिन डगर ..

दादा के मोटे चश्मे की धूर नहीं धुल पायी
चौका रूखा अदहन सूखा दाल नहीं घुल पायी ,
लहुरा लरिका मार खा गया , अनायास ही अबकी ||५|| कठिन डगर ..

मन-रघुवा की साध-प्रियतमा बेले पर ललचाये
इस अकाल-बेला में बेला कहाँ से कोई लाये ,
फुला के गेंदे जैसा मुंह वह भी है अनकी - अनकी ||६|| कठिन डगर ..

भैय्या ,वह भी इक दुनिया है जल है जिसकी थाती
तृप्त देखकर औरों को जिसकी छाती जल जाती ,
मत्स्य-न्याय की इस दुनिया में कौन सुनेगा किसकी !,||७|| कठिन डगर ..

अपनी मर्जी के सब मालिक सूरज चाँद सितारे
उन्हें देख ललचाये से दृग , प्यासे हारे , हा रे !
सीमित होकर मांग रहा है , परिधि पयोधि गगन की ?, ||८|| कठिन डगर ..

हे 'बौना' कवि , यही मान ले दुनिया अक्कड़ - बक्कड़
बूझ नहीं पाया है अब तक कोई लाल बुझक्कड़ ,
सच की नौका बहुत दूर है , उलझी - अटकी - भटकी ||९|| कठिन डगर ..
(अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी)


योगराज प्रभाकर
”प्यासा कुआं “

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कत्ल पेड़ों का हुआ तो, हो गया प्यासा कुआँ !
तिश्नगी अब क्या बुझाएगा भला तिश्ना कुआँ !

पनघटों पर ढूँढती फिरती सभी पनिहारियाँ,
एक दिन तो लौट कर आयेगा बंजारा कुआँ !

बस किताबों में नजर आएगा, ये अफ़सोस है
हो गया इतिहास अब ये भूला बिसरा सा कुआँ !

एक दिन बेटी को जिसकी खा गया था रात में,
उसको तो ख़ूनी लगे उसदिन से ही अँधा कुआँ !

मौत शायद टल ही जाये धान की इंसान की,
गर किसी सूरत कहीं ये हो सके ज़िन्दा कुआँ !

अब यकीनी लग रहा है घर में नन्हा आएगा,
उसकी माता ने बहु संग प्यार से पूजा कुआँ !

ये मेरी आवाज़ में ही नकल करता था मेरी,
जो भी मैं कहता इसे, वोही सुनाता था कुआँ !

उसको भागीरथ कहेगा आने वाला वक़्त भी,
घर के आँगन में कभी जो लेके आया था कुआँ !
(योगराज प्रभाकर)


शशि संजीव
“प्यास”

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एक जल सोत्र - प्यासे अनेक
सांसें सीमित - चाहतें अनेक
पल पल बदलती इस दुनिया में
बदले है रंग प्यास भी
हर पल हर घड़ी...
इच्छाओं के मरुस्थल में
खींचती है जब मृगतृष्णा किसी पूर्ति की
अभावों के मारे खींचतें चले जाते हैं
बेबस लाचार कुछ लोग ...
पूर्ति न सही पर प्यासों की भीड़ में हो कर शुमार
सांत्वना पा लेते हैं वे लोग
हकीक़त ज़िन्दगी की अपना लेते हैं वे लोग
की प्यास कभी कभी कोई
जीवनपर्यंत बुझती नहीं...
(शशि संजीव)

2 Comments:

  1. डॉ .अनुराग said...
    दिलचस्प........कविता अपनी बंधी बंधी लीक से हटकर लिखी हुई है ....
    हरीश सिंह said...
    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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