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शीर्षक 02 – खिङकियाँ

1.
इतने ऊँचे महल हैं सारे
बात करते हैं आसमां से
बहुत दूर तक दिखता है
जब झांकते हैं हम यहाँ से
इन शानों शॊकत के सब मालिक
दिखते हैं हरदम हैरां से
खिङकियाँ सभी बंद रहतीं
ताजी हवा भला आये कहाँ से

------------------------------- समीर लाल - Sun Jan 29, 2006 9:06 am

2.
लाल बिंदी
जो तुमने लगा दी थी
एक बार
उँगली को गोल
भौंहो के ठीक बीच
बडे एहतियात से
फिर थाम कर
मेरा चेहरा
निहारा था
मंत्रमुग्ध
आज सूरज
बन कर
धूप का गोल टुकडा
सज जाता है
मेरे माथे पर
खुली खिडकी से
तुम झाँकते हो अंदर
मैं पेशोपेश में
सोचती हूँ
तुम हो
या कोई ढीठ सूरज
जो रंग रहा है
मेरे कपोलों को
बेधडक, शैतानी से

------------------------------- प्रत्यक्षा सिन्हा - Mon Jan 30, 2006 4:38 pm

3.
मैं अनजान था
शायद

मेरी दुनियाँ के घरों कि
खिङकियों पर हमेशा
एक झीना,रुपहेला
परदा टंगा रहता था

उसकी
दूसरी तरफ
तेरी छवि
कुछ धुंधली
नजर आने पर भी
मुझे पहचान में
आती रही

तू अक्सर
किसी अप्सरा की तरह
अचानक से आकर
फिर
बोझिल हो जाती

और तब मैं उसे
अपनी नींद में
आने वाले किसी
सुखद सपने की तरह
भूलकर
फिर काम मे लग जाता

मुझे याद है
शायद मैं गलत नहीं
ये सिलसिला
तब तक चला
जब तक उन
खिडकियों पर
वो झीने रुपहले पर्दे थे

------------------------------- संगीता मनराल - Mon Feb 13, 2006 4:51 pm